यूनियन बजट 2026–27: ऑटो PLI पर कोई नया एलान नहीं, लेकिन सेक्टर की अहमियत बरकरार
केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण द्वारा पेश किए गए यूनियन बजट 2026–27 में ऑटोमोबाइल और ऑटो कंपोनेंट सेक्टर के लिए प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव यानी PLI स्कीम को लेकर कोई नया एलान या संशोधन नहीं किया गया। इसके बावजूद ऑटो सेक्टर सरकार की दीर्घकालिक मैन्युफैक्चरिंग रणनीति का एक मजबूत आधार बना हुआ है। बजट भले ही इस बार प्रत्यक्ष राहत लेकर नहीं आया हो, लेकिन नीतिगत निरंतरता ने यह स्पष्ट कर दिया है कि ऑटो उद्योग को भारत की औद्योगिक विकास यात्रा में अब भी केंद्रीय भूमिका में देखा जा रहा है।
आर्थिक सर्वेक्षण 2026 के मुताबिक ऑटोमोबाइल उद्योग देश में तीन करोड़ से अधिक लोगों को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से रोजगार उपलब्ध कराता है। इसके साथ ही भारत के कुल जीएसटी संग्रह में लगभग 15 प्रतिशत का योगदान इसी सेक्टर से आता है। ये आंकड़े बताते हैं कि ऑटो सेक्टर न केवल मैन्युफैक्चरिंग बल्कि रोजगार सृजन और राजस्व के लिहाज से भी भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ बना हुआ है।
ऑटोमोबाइल और ऑटो कंपोनेंट्स के लिए PLI स्कीम को सितंबर 2021 में 25,938 करोड़ रुपये के कुल परिव्यय के साथ मंजूरी दी गई थी। इस योजना का उद्देश्य एडवांस्ड ऑटोमोटिव टेक्नोलॉजी से जुड़े वाहनों और कंपोनेंट्स के घरेलू निर्माण को बढ़ावा देना था। सितंबर 2025 तक इस स्कीम के तहत 35,657 करोड़ रुपये का निवेश आकर्षित किया जा चुका है, जिससे लगभग 48,974 नए रोजगार सृजित हुए हैं। इन आंकड़ों से साफ है कि बजट में नया एलान न होने के बावजूद स्कीम का असर जमीनी स्तर पर लगातार दिखाई दे रहा है।
सरकार का लक्ष्य भारत को इलेक्ट्रिक और हाइड्रोजन जैसे अगली पीढ़ी के मोबिलिटी सॉल्यूशंस का वैश्विक मैन्युफैक्चरिंग हब बनाना है। इसी दिशा में एडवांस्ड केमिस्ट्री सेल बैटरी स्टोरेज के लिए अलग से PLI स्कीम लागू की गई, जिसके तहत 18,100 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है। इस योजना के जरिए देश में 50 GWh बैटरी निर्माण क्षमता विकसित करने का लक्ष्य रखा गया है, जिसमें से अब तक 40 GWh क्षमता का आवंटन किया जा चुका है। इससे ईवी सप्लाई चेन के स्थानीयकरण को मजबूती मिली है और आयात पर निर्भरता घटाने में मदद मिली है।
डिमांड साइड को मजबूत करने के लिए सितंबर 2024 में पीएम ई-ड्राइव स्कीम की शुरुआत की गई थी, जिसके लिए 10,900 करोड़ रुपये का बजट तय किया गया है। इस योजना के तहत इलेक्ट्रिक दोपहिया और तिपहिया वाहनों को प्रोत्साहन दिया जा रहा है, जबकि ई-ट्रक और ई-एंबुलेंस जैसे नए सेगमेंट्स को भी समर्थन मिल रहा है। इसके साथ-साथ चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर के विस्तार और वाहन परीक्षण एजेंसियों के आधुनिकीकरण पर भी विशेष जोर दिया गया है।
इलेक्ट्रिक पब्लिक ट्रांसपोर्ट को बढ़ावा देने के लिए अक्तूबर 2024 में पीएम ई-बस सेवा पेमेंट सिक्योरिटी मैकेनिज्म अधिसूचित किया गया था। इस योजना के तहत देशभर में 38,000 से अधिक इलेक्ट्रिक बसें चलाने का लक्ष्य रखा गया है। 3,435.33 करोड़ रुपये के प्रावधान के जरिए बस ऑपरेटर्स और निर्माताओं को भुगतान सुरक्षा दी जा रही है, जिससे शहरी परिवहन में ई-बसों की हिस्सेदारी तेजी से बढ़ने की उम्मीद है।
मार्च 2024 में शुरू की गई एसएमईसी योजना के तहत भारत में इलेक्ट्रिक पैसेंजर कारों के निर्माण को बढ़ावा देने के लिए कुछ हाई-वैल्यू ईवी को रियायती सीमा शुल्क पर आयात की अनुमति दी गई है। इसके लिए कंपनियों को कम से कम 4,150 करोड़ रुपये का निवेश करना होगा और तय लोकलाइजेशन लक्ष्यों को पूरा करना अनिवार्य होगा। इसका मकसद घरेलू मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा देने के साथ-साथ वैश्विक ईवी कंपनियों को भारत में निवेश के लिए आकर्षित करना है।
यूनियन बजट 2026–27 में भले ही ऑटो PLI पर कोई नया एलान नहीं हुआ हो, लेकिन इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग के लिए 40,000 करोड़ रुपये के नए PLI प्रस्ताव और कैपिटल गुड्स सेक्टर को मजबूत करने के लिए हाई-टेक टूल रूम स्थापित करने की घोषणा यह संकेत देती है कि सरकार व्यापक मैन्युफैक्चरिंग इकोसिस्टम को सशक्त करने की दिशा में काम कर रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि इन कदमों का अप्रत्यक्ष लाभ ऑटो और ऑटो कंपोनेंट सेक्टर को जरूर मिलेगा, क्योंकि यह सेक्टर इलेक्ट्रॉनिक्स और कैपिटल गुड्स उद्योग से गहराई से जुड़ा हुआ है।
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